गुरुवार, 5 नवंबर 2015

बोल नये सपने - माखनलाल चतुर्वेदी

कहानी बोल नये सपने!
अरी अभागिन, पहिले ही
क्यों ओंठ लगे कँपने?
कहानी बोल नये सपने!
देख तो, प्राण में एक तूफान-सा
लोटता-सा चला जा रहा है कहाँ?
व्यक्ति-वामन, उठा आ रहा पैर ले
एक रक्खे यहाँ, एक रक्खे वहाँ;
श्रृंखला सागरों को पिन्हाता हुआ-सा
गगन खेल-घर-सा बनाता हुआ,
हर लहर में नया स्वाद लाता हुआ
हर बहर में नया जग बनाता हुआ-
पंख खोल अपने
कहानी बोल नये सपने!

वीणा का तार - माखनलाल चतुर्वेदी

विवश मैं तो वीणा का तार।
जहाँ उठी अंगुली तुम्हारी,
मुझे गूँजना है लाचारी,
मुझको कम्पन दिया, तुम्हीं ने,
खुद सह लिया प्रहार।
दिखाऊँ किसे कसक सरकार!
अभागा मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।
टूक-टूक स्वर ही क्या कम था!
जो उस को बेड़ी पहनादी?
क्या बन्दी स्वर के चढ़ने को,
बन्धन की सीढियाँ बना दीं?
मधुरिमा पर यह अत्याचार,
तुम्हारी ध्वनि-वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।
तारों में यों कस-कस रखना,
फिर सीढियाँ बनाना कैसा?
ठोकर से गिरता स्वर-बन्दी,
ठोकर मार चढ़ाना कैसा?
धन्य यह जग का स्वर-सत्कार!
कैद हूँ मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।
तुम्हारे इंगित पर इतिहास,
चढ़ा जाता हूँ मैं दृग मींच,
खींच दी तुमने क्यों फिर हाय,
कलेजे पर खूँटी की खींच?
मधुरिमा दूँ? फाँसी पर? प्यार,
व्यथित, बेबस, वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।
तुम्हारे छू जाने से दुःख
दे चला कौन ज्वार, चीत्कार,
फाँसियों पर बन कर यह कौन,
आ गया निठुर चढ़ाव, उतार!
मधुर यह मौत, मधुर यह भार।
अभागा मैं वीणा का तार!
विवश मैं तो वीणा का तार।
चढ़े जाते हो गूँजों पर,
उतरते हो झंकारों में,
फूट जायेंगे कोमल अंग,
तुम्हारी धुन के तारों में।
न सह स्वर मेरे संग प्रहार,
सहेगा सब वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।
न मुझमें रंग, न मुझमें रूप,
न दीखे मेरा कहीं शरीर।
किन्तु मेरे प्राणों पर हाय,
टूटते हो तुम आलमगीर!
मधुरिमे! तू कितनी लाचार,
अभागा मैं वीणा का तार।
विवश मैं तो वीणा का तार।

न्याय तुम्हारा कैसा - माखनलाल चतुर्वेदी

प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?
यह इधर साधु की कुटिया जो तप कर प्राण सुखाता,
तेरी वीणा के स्वर पर दीनों में मिल-मिल जाता।

मल धोता, जीवन बोता, छोड़े आँसू का सोता,
जब जग हरियाला होता, तब वह हरियाला होता।
उसके पड़ोस में ही हा! यह हत्यारे का घर है, 
जो रक्तमयी तपड़न पर करता दिन-रात गुजर है!

फिर इधर खेत गेहूँ के हँसते हैं लह-लह करते,
क्या जाने इस हँसने पर कितने किसान हैं मरते?
हरियाली के ब्रह्मापर कितनी गाली बरसेंगी?
छोटी-छोटी सन्तानें रट ’अन्न-अन्न’ तरसेंगी,

होंगे पक्वान्न किसी के उसकी इस रखवाली में
उसका यह रक्त सजेगा कुछ धनिकों की थाली में
वह भी देखेगा इस को जब आयेगा त्योहार,
उस दिन किसान की मेहनत, वह हरियाला संसार।

उसके आँसू की दुनियाँ, उसके जीवन का भार,
पंडित हो या कि कसाई, राजा हो या कि चमार,
सबकी थाली का होगा उसका गेहूँ श्रृंगार।
प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?

फिर नभ की ये चमकी-सी छोटी-छोटी लटकनियाँ
निशि की साड़ी की कनियाँ प्रभु की ये बिखरी मनियाँ।
अपने प्रकाश का प्यारा ये खोले हुए खजाना,
बह पड़े कहीं इनको तो जीवन भर है बिखराना।

झाँको वे देख पड़ेंगे, ग्वालों की झोपड़ियों पर,
ताको, वे देख पड़ेंगे, विद्वानों की मढ़ियों पर!
उनके दर्शन होते हैं, देवालय द्वारों पर भी,
पर हा वे लटक रहे हैं इन कारागारों पर भी!

फिर वे दाखों की बेलें जिनसे पंछी दल खेलें
जी में मधुराई लाने, वर्षा हिम आतप झेलें!
इनकी गोदी के धन हैं मणियों से होड़ लगाते
ये रस से पूरे मोती, किसका जी नहीं चुराते!

किसकी जागीरी है यह, इनकी मीठी तरुणाई
किसका गुण गाने इनमें चिड़ियों की सेना आई?
बीमारों की तश्तरियों में ये जीवन देते हैं,
चूसे जाते हैं ये, पर नव अपनापन देते हैं!

वैद्यों के आसव बन कर धमनी में गति पहुँचाते,
पर हा, उनको ही घातक मदिरा बनवाकर पाते!
या धन लोलुप ऐयाशों के, भोगों की थाली को
दाखों से भरते पाते धन के लोभी माली को!
प्रिय न्याय तुम्हारा कैसा,
अन्याय तुम्हारा कैसा?

बेटी की बिदा - माखनलाल चतुर्वेदी

आज बेटी जा रही है,
मिलन और वियोग की दुनिया नवीन बसा रही है।

मिलन यह जीवन प्रकाश
वियोग यह युग का अँधेरा,
उभय दिशि कादम्बिनी, अपना अमृत बरसा रही है।

यह क्या, कि उस घर में बजे थे, वे तुम्हारे प्रथम पैंजन,
यह क्या, कि इस आँगन सुने थे, वे सजीले मृदुल रुनझुन,
यह क्या, कि इस वीथी तुम्हारे तोतले से बोल फूटे,
यह क्या, कि इस वैभव बने थे, चित्र हँसते और रूठे,

आज यादों का खजाना, याद भर रह जायगा क्या?
यह मधुर प्रत्यक्ष, सपनों के बहाने जायगा क्या?

गोदी के बरसों को धीरे-धीरे भूल चली हो रानी,
बचपन की मधुरीली कूकों के प्रतिकूल चली हो रानी,
छोड़ जाह्नवी कूल, नेहधारा के कूल चली चली हो रानी,
मैंने झूला बाँधा है, अपने घर झूल चली हो रानी,

मेरा गर्व, समय के चरणों पर कितना बेबस लोटा है,
मेरा वैभव, प्रभु की आज्ञा पर कितना, कितना छोटा है?
आज उसाँस मधुर लगती है, और साँस कटु है, भारी है,
तेरे बिदा दिवस पर, हिम्मत ने कैसी हिम्मत हारी है।

कैसा पागलपन है, मैं बेटी को भी कहता हूँ बेटा,
कड़ुवे-मीठे स्वाद विश्व के स्वागत कर, सहता हूँ बेटा,
तुझे बिदाकर एकाकी अपमानित-सा रहता हूँ बेटा,
दो आँसू आ गये, समझता हूँ उनमें बहता हूँ बेटा,

बेटा आज बिदा है तेरी, बेटी आत्मसमर्पण है यह,
जो बेबस है, जो ताड़ित है, उस मानव ही का प्रण है यह।
सावन आवेगा, क्या बोलूँगा हरियाली से कल्याणी?
भाई-बहिन मचल जायेंगे, ला दो घर की, जीजी रानी,
मेंहदी और महावर मानो सिसक सिसक मनुहार करेंगी,
बूढ़ी सिसक रही सपनों में, यादें किसको प्यार करेंगी?

दीवाली आवेगी, होली आवेगी, आवेंगे उत्सव,
’जीजी रानी साथ रहेंगी’ बच्चों के? यह कैसे सम्भव?

भाई के जी में उट्ठेगी कसक, सखी सिसकार उठेगी,
माँ के जी में ज्वार उठेगी, बहिन कहीं पुकार उठेगी!

तब क्या होगा झूमझूम जब बादल बरस उठेंगे रानी?
कौन कहेगा उठो अरुण तुम सुनो, और मैं कहूँ कहानी,

कैसे चाचाजी बहलावें, चाची कैसे बाट निहारें?
कैसे अंडे मिलें लौटकर, चिडियाँ कैसे पंख पसारे?

आज वासन्ती दृगों बरसात जैसे छा रही है।
मिलन और वियोग की दुनियाँ नवीन बसा रही है।
आज बेटी जा रही है।