बुधवार, 13 जनवरी 2016

मौन - महेश चंद्र द्विवेदी

मेरा छः वर्ष का पोता भ्रमित होकर‚
दुनिया की चालों से चकित होकर‚
एक निश्छल उत्तर की आशा में‚
अनुभवी बाबा से ज्ञान की पिपासा में‚
एक दिन पूछ बैठा मेरी आंखों में झांककर‚
क्या सचमुच सत्य होता है विजयी असत्य पर?
               और पौत्र के समक्ष आज मैं मौन हूँ।

मेरे गुरुओं ने हर युग में राम की जीत
और रावण की हार होना पढ़ाया था‚
मेरे पिता ने मुझे असत्य पर‚ अंत में‚
सदैव सत्य का वर्चस्व होना बताया थाऌ
भगवद्गीता में कृष्ण ने दिग्भ्रमित अर्जुन को‚
निद्र्वन्द्व हो धर्मयुद्ध लड़ने का उपदेश सुनाया था‚
अपने पुत्र इसी प्रश्न पर मैं ने निश्शंक‚
हो उसे 'सत्यमेव जयते' का मार्ग दिखाया था।
                 परन्तु पौत्र के समक्ष आज मैं मौन हूँ।

ऐसा नहीं है कि गत युगों में प्रतिदिन‚
प्रतिपल सत्य असत्य को पछाड़ता था‚
तब भी मथुरा में कंस निज भगिनी के‚
पुत्रों को जन्मते ही पटककर मारता था।
पर जब भी दुष्टों के पाप का घड़ा 
ऊपर तक भरकर छलकने लगता था‚
उनके दमन को कोई राम‚ कोई कृष्ण
किसी माँ के गर्भ में मचलने लगता था।
                  आज मैं इतना भी किस मुँहह से कहूँ?
                  अतः पौत्र के समक्ष आज मैं मौन हूँ।

अब अत्याचारी स्वयं सत्ताधारी बन‚
निद्र्वन्द्व हो समस्त देश को चरता है‚
जब हो सर्वत्र मगरमच्छों का राज‚
आर्त गज की गुहार कौन सुनता है?
आज पापों का घड़ा पल–पल भरता‚
क्षण–क्षण उफनता और छलकता है‚
विष्णु हो गये हैं क्षीरसागर में चिरसमाधिस्थ‚
दुष्ट–विनाशार्थ जन्म का कष्ट कौन सहता है?
                      आज मैं अर्जुन सम भ्रमित हूँ‚ मौन हूँ।
                      अतः पौत्र के समक्ष आज मैं मौन हूँ।

अमरीकन भौजी - महेश चंद्र द्विवेदी

फून आवा है कि अबकि होरी पर ऐहैं भौजी अमरीका वाली‚
गोरी भौजी के आवन की खबर सुन‚ सनक गै हमार घरवाली।
बोली–"पहिलवै कौन कम सांसत रहै‚ पड़ौसन लौ टले न टाली‚
तुम्हरे संग घुलमिल के रंग खेलैं‚ दूर दूर की सलहज औ साली।"

उहिके मन मा घोर संसय जाग‚ यहि से ऊ चिहूंक चिहुंक चलै लाग‚
कहै–"कैसे सपरिहै? नौकर तो सराब पी औंधे मुंह पड़े हुईहैं नाली"
मन मा सोचे–" इनका रिझावन का कौन कम है – सांवली और काली"‚
तब से अब रोज गालन पै पौडर – लाली लगाय‚ निरखै कानन की बाली।

हमार लॉन लौ अमरीकन लागै लाग‚ मटकै लाग माली मनमौजी‚
है तो ऊ नामी कामचोर‚ पर है नये – नये फूल – पत्तिन का खोजी।
बौराय गवा – गेंदन बिच भांग लगाइस‚ और गुलाबन बिच कलौंजी‚
क्यारिन बिच नाचे – गावै‚ यहि बरस अइहैं हमरी अमरीकन भौजी। 

होरी के दिन जीन्स – टाप – बेल्ट पहिने‚ फाट पड़ी अमरीकन भौजी‚
गजगामिनी की जीवित मिसाल‚ ऊपर से बाल कटवाय रहैं फौजी।
पहली बार होरी केर हुड़दंग देख‚ उंमंग में आइके कूद पड़ी हौजी‚
तब हमार ऊ हंसके बोली‚ "हाय‚ होरी पै हुरियाय गईं अमरीकन भौजी।"

यह तेरी सौगात नहीं - महेश चंद्र द्विवेदी

इस दिल के बुलाने पर तुम नहीं आये कोई बात नहीं
मेरे पैगाम पर हँस कर खिल्ली उड़ाई‚ कोई बात नहीं

मेरे दावतनामे को कानी आँख न देखा‚ कोई बात नहीं
मेरी शामों को वीरान–बियावान बनाया‚ कोई बात नहीं

मेरी चौखट तुम्हारे कदमों की सरहद है‚ कोई बात नहीं
मेरी मय्यत में शामिल न होने की ज़िद है‚ कोई बात नहीं

अपने ख़यालों तक में मेरा ज़िक्र न आने देना‚ कोई बात नहीं
बस आँख से ढलके आँसू के लिये न कहना‚ यह तेरी सौगात नहीं।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

आज के दौर में जंगल उदास हैं - उमेश पंत

आज के दौर में जंगल उदास हैं
और वो लड़की जो बाघ की खाल से बना फरकोट पहनकर
शीशे में देख मुस्कुरा रही है
हमें जंगली-सी दिखती है।
पर ये उस दौर की बात है
जब जंगल उतने जंगली नहीं थे
न ही आदमी उतना शहरी ।
जब एक दहाड़ सुनाई देने पर
अक्सर कहते थे गाँव के लोग
कि बाघ आ गया ।
हम सुनते थे अपने पापा से बाघ के किस्से
कि कैसे उस रोज़ आया था बाघ
हमारे शेरा को ले जाने
और पापा ने किया था टौर्च लेकर पीछा
हम आज तक पापा के किस्से से उपजे
उस रोमांच को नहीं भूले हैं
जिसे याद कर सिहर जाती है रुह आज भी ।
उस रोज़ गाँव जाने पर ताऊजी ने बताया था
कि शेरा को बाघ ले गया
तो बहुत गुस्सा आया था बाघ पर ।
कल्पनाओं में तैरती-सी बही जाती थी
बाघ की छंलांगें
और जब तब सुनाई देती थीं
जंगलों को कँपा देती उसकी गर्जनाएँ ।
कैसे तो बाघ हो जाता था उस लमहे में
किस्सागोई का रोमांचकारी अनुभव ।

कि कैसे उस दिन
हमारे छोटे से कस्बे में
हुई थी बाघ पर विजय की वो यात्रा
आगे-आगे ट्रक पर लदा बाघ का पिंजरा
और पीछे-पीछे सैकड़ों की तादात में जुटे हुए लोग
अब तलक ज़िन्दा है हमारी आँख में
बाघ की निर्भय आँखों का वो अक्स ।
पर एक दिन हमने देखा
कि बाघ मरा हुआ रखा है
मवेशियों के अस्पताल में
उस दिन उसकी आँखों में बहुत पास से देखा था

कि हम सभी की मौत के जैसे ही
कुछ खाली-सा कर देती है उसकी मौत भी
और उस खालीपन में भरने लगती है
एक खास किस्म की उदासी ।
उस रोज़ किसी ने नहीं कहा था
कि घट रही है उनकी तादात
पर आज जबकि बाघ की जीवन-यात्रा
छूं रही है अपना अन्तिम पड़ाव
तेा आ रहा है समझ 
घट जाने की उस घटना का दर्द भरा मतलब ।
हज़ार की तादात जैसे जैसे कमती जा रही है
ख़त्म होते लग रहे हैं
बाघ ही नहीं
कई किस्से, कई रोमांचक अनुभव
जंगली उदासी को पाटते
निर्भय आँखों के कई अक्स
पापा गाँव छोड़कर कस्बे में रहने लगे हैं
और हम कस्बे से आ गए हैं शहर में
और इस बीच
बाघ जो ज़िन्दा था हमारे आस-पास
पापा के सच और हमारी कल्पनाओं में,
ले रहा है इतिहास के गर्भ में अपनी अन्तिम साँस
हमें रोकना ही होगा इस गर्भपात को
ताकि न कह सके आने वाली पीढ़ी
कि शहरी होना जंगली होना भी नहीं होता ।

आज फिर इन्साफ़ को मिट्‍टी में दफ़नाया गया - उमेश पंत

आज फिर इन्साफ़ को मिट्‍टी में दफ़नाया गया
जमहूरियत की शक्ल का कंकाल फिर पाया गया ।

उनकी सियासत की जदों में क़त्ल मानवता हुई
कहके यही इन्साफ़ है फिर हमको भरमाया गया ।

जिस शख़्स की ग़लती के कारण मिट गई जानें कई
उसको बड़े आदर से उसके देश भिजवाया गया ।

आता है अब भी ज़हन में बच्चा वो मिट्‍टी में दबा
अरसे से हर अख़बार की सुर्ख़ी में जो पाया गया ।

सालों से जो आँखें लगाए आस बैठी थी उन्हें
नृशंसता की हद का यूँ अहसास करवाया गया ।

कैसे हैं ज़ालिम लोग ये सत्ता में जो बैठे हुए
न्याय को जो इस कदर फाँसी पे लटकाया गया ।

शहर में उस दिन बही जो गंध भ्रष्टाचार थी
यूनियन कार्बाईड जिसका नाम बतलाया गया ।

बैठेंगे वो कुछ लोग बस कुछ वर्ष कारावास में
त्रासदी की भूमिका रचते जिन्हें पाया गया ।

जी रहे थे हम के जिसमें, वहम था जनतंत्र का
लोक को यूँ तंत्र के पैरों से रुंदवाया गया ।

तंत्र ही सब कुछ यहाँ है लोक की औकात क्या
इस पुराने सत्य को संज्ञान में लाया गया ।

उनके मंहंगे शौक और सस्ता है कितना आदमी
कल हमें इस आर्थिक पहलू को समझाया गया ।

अन्याय की स्याही से ये लिक्खा हुआ मृतलेख है
कानून का जामा ओढ़ाकर हमको सुनवाया गया ।

तब मरे थे लोग अब टूटा भरोसे का भी दम
इस तरह भोपाल पर भोपाल दोहराया गया ।